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छोटे कदम, बड़ी उड़ान: पेमली की सफलता की कहानी

18 साल की उम्र में शादी के बाद पेमली ससुराल आई। नई जगह और नए परिवार के साथ उसे थोड़ा अटपटा सा लग रहा था पर घर के कामकाज और परिवार वालों के लिए कपड़े सिलने में उसका समय निकल जाता था। शादी के चार महीने बाद भी पेमली पड़ोसी एवं अन्य महिलाओ से बात करने में थोड़ी शर्माती थी। एक दिन घर के कुछ काम से वह बाहर निकली, तो उसने देखा कि कुछ महिलाएँ चबूतरे पर बैठी बातें कर रही है। वह रुकी और उनकी बातें सुनने लगी। उसने देखा कि एक महिला, जिसका नाम परताबी है, सभी महिलाओं को छेटी रखने के साधनों के बारे में बता रही है। पेमली कुछ देर तक वहाँ रुककर सुनती रही और फिर अपने घर आ गई। कुछ हफ्तों बाद, परताबी गाँव में घूमते-घूमते पेमली के घर आई। पेमली ने उसे पहचान लिया कि यह वही महिला है जो साधनों की जानकारी दे रही थी। परताबी अंदर आई और पेमली से बातचीत करने लगी। पेमली को पारबती की बाते अच्छी लगी। पेमली और पारबती में थोड़ी ही देर में दोस्ती हो गई। बातों-बातों में पेमली को पता चला कि परताबी अर्थ नामक संस्था से जुड़ी हुई है। थोड़ी और बात करने सॆ पेमली को समझ आया कि परताबी अपने गाँव में बच्चों में छेटी रखने के साधन व माहवारी संबंधित समान सस्ते दाम पर बेचती है। वह एक स्वास्थ्य उद्यमी के रूप में कार्य कर रही है, जिसे गाँव में “तरुणी सखी” के नाम से जाना जाता है। परताबी जब भी पेमली से मिलने आती, तो पेमली उससे कुछ आवश्यक सामान भी खरीदने लगी। समय के साथ दोनों अच्छी दोस्त बन गईं। एक दिन, जब परताबी पेमली से मिलने आई तो उसने बताया कि उसके पति की नौकरी उदयपुर में लग गई है और वह अपने परिवार के साथ गाँव छोड़कर जा रही है। बातों-बातों में, परताबी ने पेमली से पूछा कि क्या वह तरुणी सखी का काम करना चाहेगी। पेमली ने तुरंत मना कर दिया और मन का डर बताया की, “मूँ तो कणे ऑलखु ही नी तो लुगाई बात किस्तर करूंगा?” पेमली और परताबी बात कर रहीं थी तभी वहाँ पेमली का पति काम से लौट आया, वह भी जानता था की परताबी तरुणी सखी का काम करती हैं। परताबी पेमली से बात कर अपने घर चली गई। परताबी के जाने के बाद पेमली ने अपने पति को बताया कि परताबी भाभी गाँव छोड़कर परिवार के साथ शहर जा रहीं हैं और उसने पेमली को परताबी का काम करने के लिए पूछा। यह सुनकर पेमली के पति ने उसे तरुणी सखी का काम करने के लिए समझाया। पेमली ने बहुत सोच-विचार के बाद अपना मन बना लिया और परताबी के घर जाकर उसे बताया कि वह तरुणी सखी का कार्य करना चाहती हैं लेकिन उसे थोड़ा संकोच है। यह सुनकर परताबी हंसी और बोली, “डर तो सबने लागे पण जू-जू काम करा आगे रास्तों खुलतों जावे ने डर खतम वे जावे।” इसके बाद दूसरे दिन जब सुनीता, जो अर्थ संस्था से जुड़ी हैं, वहां परताबी से मिलने आई तो परताबी ने उसको पेमली के बारें में बताया। वह दोनों फिर पेमली के घर गए। सुनीता ने पेमली से उसके बारें में थोड़ी जानकारी ली और सखी के काम के बारें में बताया। फिर उसे थोडा समान देकर उनके बारें में समझाया कि केसे महिलाओं को देना हैं, साथ ही ध्यान रखना हैं कि एक महिला की बात दूसरी महिला को कभी नहीं बतानी। उनसे अच्छी तरह बात करनी हैं ताकि महिलाएँ उसके पास समान लेने आए। कुछ दिनों तक पेमली, सुनीता और परताबी के साथ गाँव में घर-घर जाकर महिलाओं से मिली और पेमली को पता चला कि यह काम कैसे करना है। कुछ ही दिनों बाद वह अकेली ही घर-घर जाकर महिलाओं से बात करने लगी। छेटी के साधनों और अन्य सामग्री जैसे, माहवारी प्रबंधन के साधन, पेशाब जाँच किट आदि जरूरत के अनुसार महिलाओं को देती तथा अर्थ और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध सेवाओं के बारे में बताती। दो-तीन बार पेमली संस्था द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में हिस्सा लेने पास के गांव भी गई, जहाँ वह और सखियों से भी मिली और उनका अनुभव सुना। तरुणी सखी के रूप में पेमली की शुरुआत छोटे कदमों से हुई। धीरे-धीरे महिलाओं का उस भरोसा बन गया पेमली से सामग्री लने लगीं। पेमली कुछ महिलाओं कॊ स्वास्थ्य केंद्र साथ लेकर जाने लगी। उसके काम की वजह से महिलाएँ उसे पहचानने लगी और उसकी सामग्री ज्यादा बिकने लगी। अब तक पेमली केवल अपने परिवार के लिए सिलाई करती थी, पर जब महिलाएँ साधन लेने उसके पास आने लगीं, तो उन्हें पता चला कि पेमली सिलाई भी करती है और वे भी उसे सिलाई के कपड़े देकर चली गईं। इस कारण धीरे-धीरे उसके पास सिलाई के भी ऑर्डर आने लगे। जब कोई महिला सिलाई के काम से आती, तो साधन संबंधी बातचीत भी हो जाती। उसने सिलाई के साथ-साथ एक छोटी किराने की दुकान भी शुरू कर दी। जिससे उसकी गाँव में पहचान बढ़ गयी और साथ ही कमाई भी अच्छी होने लगी। अर्थ के तरुणी कार्यक्रम के अंतर्गत वर्तमान में 319 महिलाएँ स्वास्थ्य उद्यमी के रूप में दक्षिण राजस्थान के चयनित गाँवों में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी साधन और जानकारी महिलाओं तक पहुँचा रही हैं। इन स्वास्थ्य उद्यमियों को “तरुणी सखी” का नाम दिया गया है। तरुणी सखियाँ गाँव की महिलाओं को छेटी रखने के साधनों और स्वस्थ्य सेवाओं के बारे में जागरूक करती हैं। इनकी मदद के लिए “प्रेरक” होते हैं, जो उन्हें मार्गदर्शन व प्रशिक्षण देती हैं, और उनके कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करती हैं। प्रेरक, तरुणी सखियों की समस्याओं को हल करने और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पेमली के अनुभव यह दर्शाता है कि गाँव में उद्यमिता और सामुदायिक भागीदारी के जरिए महिलाएँ, स्वस्थ परिवार नियॊजन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकती हैं।